डायाफ्राम कैसे काम करता हैं – how does diaphragm work

आज मैं आपको हमारे शरीर के एक ऐसे अंग के बारे में बताने जा रहा हूं, जो हमारे शरीर के लिए जो हमारे प्राण के लिए, बहुत ज्यादा आवश्यक है. जिसकी वजह से हम सांस ले पाते हैं, आप सोचेंगे कि क्या मैं फेफड़े के बारे में बताने जा रहा हूं. जी नहीं मैं फेफड़े के बारे में बताने नहीं जा रहा हूं. मैं फेफड़े से भी एक बहुत ही जबरदस्त ऑर्गन के बारे में बताने जा रहा हूं. जो हमे सांस लेने में बहुत ज्यादा मदद करता है। अगर वह ना होना तो हम बिल्कुल सांस ही नहीं ले पाएंगे, और हम तुरंत ही मर जाएंगे, इसलिए मैं इस अंग को शरीर का सबसे जबरदस्त बॉडी पार्ट बताता हूं।

देखिए जिस जबरदस्त बॉडी पार्ट की मैं बात कर रहा हूं, उसका नाम है डायाफ्राम, जी हां वही डायाफ्राम जो हमारे फेफड़े के नीचे रहता है।

देखिए डायाफ्राम एक dome shaped यानी गुंबद के आकार का अंग होता है, जो कि हमारे थोरेसिक कैविटी यानी सीने वाले भाग के वक्ष गुहा को और हमारे abdominal कैविटी यानी पेट वाले उदर गुहा को अलग करता है।

डायाफ्राम एक c shaped का, मसल्स से बना हुआ ऑर्गन होता है, जिसके बीच का भाग अपॉन्यूरोसिस नाम के fibrous tissue से बना रहता है। और इसके यह किनारे के भाग मसल से बने होते हैं। क्योंकि डायाफ्राम के ठीक नीचे इसके राइट वाले हिस्से में लिवर रहता है, इसलिए यह वाला भाग थोड़ा उठा हुआ होता है, और चुकी इसके ऊपर बाएं तरफ ह्रदय होता है, इसलिए इसका बाया भाग थोड़ा सा नीचे की ओर झुका होता है। इसमे कुछ होल्स होते हैं जहाँ से हमारा food pipe, blood artery और veins पास होती हैं।

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मैंने अभी आपको बताया है कि इसका सांस लेने में बहुत ज्यादा बड़ा रोल है, even फेफड़े से भी ज्यादा बड़ा रोल है, तो चलिए आपको यह बताते हैं कि इसका सांस लेने में, इसका बहुत ही इंपॉर्टेंट रोल कैसे है। पर शुरू करने से पहले अगर यह वीडियो आपको पसंद आएगा तो आप वीडियो लाइक कर दीजिएगा।

देखिए डायाफ्राम बिल्कुल हमारे फेफड़े के नीचे रहता है, और यह हमारे फेफड़े से फेफड़े के ऊपर पाए जाने वाले sac pleural sac से कनेक्टेड रहता है, देखिए होता क्या है…

हमारे स्पाइन से एक nerve आती है, फ्रेनिक नर्व, जो कि हमारे डायाफ्राम से आकर जुड़ जाता है। ब्रेन लगातार हमारे डायाफ्राम को यह सिग्नल देता है कि वह लगातार सिकुड़ता रहे और फैलता रहे। यानी डायाफ्राम नीचे की ओर जाता रहे और ऊपर की ओर जाता रहे। यह एक involuntary एक्शन होता है, इसको हम चाह कर भी रोक नहीं सकते हैं।

देखिए हमारा नर्वस सिस्टम जब हमारे डायाफ्राम को सिग्नल देता है, तो हमारा डायाफ्राम कॉन्ट्रैक्ट होकर नीचे की ओर जाता है, जब हमारा डायाफ्राम नीचे जाता है, तो उससे लगा हुआ हमारा फेफड़ा भी नीचे की ओर जाता है, जब हमारा फेफड़ा नीचे जाता है, तब हमारा फेफड़ा एक्सपेंड हो जाता है, और इस तरह हमारे फेफड़े में एक नेगेटिव प्रेशर बन जाता है। जिसका नतीजा यह होता है कि हमारे फेफड़े में नाक के द्वारा ढेर सारा एयर भर जाता है। जिस एयर में नाइट्रोजन ऑक्सीजन जैसे गैसेस होते हैं, इसे inhalation कहते हैं।

उसके बाद फिर से हमारा नर्वस सिस्टम हमारे डायाफ्राम को सिंगल देता है, कॉन्ट्रैक्ट होकर ऊपर की ओर जाने के लिए, जब हमारा डायाफ्राम ऊपर की ओर जाता है, तो हमारे डायाफ्राम से लगा हुआ फेफड़ा भी ऊपर जाता है, जिससे हमारा फेफड़ा कॉन्ट्रैक्ट हो जाता है, और पॉजिटिव प्रेशर के साथ हमारा फेफड़ा बाहर की ओर एयर को exhale कर देता है।

इस तरह लगातार फ्रेनिक नर्व के सिग्नल से डायाफ्राम लगातार ऊपर नीचे होता रहता है, और उसे लगा फेफड़ा एक्सपेंड होकर और contract हो कर एयर को इन्हेल और exhale करता रहता है। और हमारे शरीर को ऑक्सीजन मिलता रहता है, जिससे हम जिंदा रह पाते हैं.

इस हिसाब से यह कह सकते हैं कि सांस लेने में फेफड़े से ज्यादा रोल हमारे डायाफ्राम का है, फेफड़ा का रोल हमारे रेस्पिरेशन में है यानी गैस के एक्सचेंज में…

डायाफ्राम का एक और रोल है हमारे बॉडी में, देखिए हमारे डायाफ्राम के नीचे हमारे स्टमक इंटेस्टाइन और यूरिनरी ब्लैडर जैसी चीजें होते हैं। जब डायाफ्राम नीचे की ओर जाता है, तो यह हमारे इन organs पर प्रेशर बनाकर हमें यूरिन feces और vomit जैसी चीजों के ejection में मदद करता है।

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