धूल से एलर्जी कैसे होती है – hypersensitivity 1 and hypersensitivity 2

इम्यून सिस्टम हमारे शरीर की रक्षा करने के लिए बना है, जब यही इम्यून सिस्टम बहुत थी अग्रेशन के साथ शरीर के नॉर्मल सेल पर असर करने लगता है, नॉर्मल सेल को भी मारने लगता है, तो इसे हमारे शरीर में हाइपरसेंसटिविटी के नाम से जाना जाता है। हाइपरसेंसटिविटी चार प्रकार की होती है, टाइप वन टाइप टू टाइप 3 टाइप 4, टाइप 1 generally हम एलर्जी के नाम से जानते हैं, टाइप टू में क्या होता है कि कुछ सर्टन सब्सटेंसस सेल के लिए टॉक्सिक हो जाते हैं इसलिए इस प्रकार के हाइपरसेंसटिविटी को साइटोटॉक्सिक के नाम से भी जानते हैं और इन दोनों हाइपरसेंसटिविटी के बारे में हम पिछले के वीडियो में बात कर चुके हैं। आज इस वीडियो में हम हाइपरसेंसटिविटी 3 और हाइपरसेंसटिविटी 4 दोनों के बारे में जान लेंगे बहुत ही शॉर्ट में….

देखिए मान लीजिए कि आप खेत में काम कर रहे हैं और खेत में काम करने की वजह से जो खेती किसानी में छोटे-छोटे पार्टिकल हवा में उड़ते रहते हैं, वह आपके lungs से होते हुए शरीर में जा रहा है। देखिए ये छोटे-छोटे पार्टिकल्स जो हमारे शरीर में जा रहे हैं, जैसे यह ब्लड में मिले, क्या होता है कि इसे शरीर एक फॉरेन substance की तरह शरीर के लिए खतरा समझने लगता है। इसीलिए होता ये है कि एक बहुत ही complex process  के बाद प्लाज्मा सेल बहुत सारे एंटीबॉडी जो कि IgG एंटीबॉडी होती हैं, वह रिलीज करने लगता है।

और होता यह है कि यह जो प्रदूषण के कारण से पार्टिकल्स किसान को खेती किसानी के वजह से शरीर में जा रहा था। जिसे शरीर मे पहुचने के बाद antigen कहते है। वह इस एंटीबॉडी के साथ bind हो जाते हैं। देखिए कोई भी बाहरी तत्व जो शरीर में पहुंचता है जिससे एंटीबॉडी जाकर जुड़ सकते हैं उसे एंटीजन ही के नाम से जाना जाता है। जैसे ही ये जो पार्टिकल एंटीबॉडी के साथ जुड़ते हैं। यह एंटीजन एंटीबॉडी कंपलेक्स का निर्माण कर लेते हैं।

देखिए एंटीबॉडी और एंटीजन कंपलेक्स बनने में कोई दिक्कत नहीं है, समस्या तब होती है जब यही एंटीजन एंटीबॉडी कंपलेक्स किसी ऑर्गन पर जाकर चिपक जाता है,किसी tissue पर और चुकी एंटीबॉडी एंटीजन कंपलेक्स बन चुका है, इसीलिए यह कंपलेक्स बहुत सारे कंप्लीमेंट्री प्रोटीन को trigg कर देता है, इन पर काम करने के लिए, इस को फॉलो करते करते न्यूट्रोफिल भी मैदान में उतर जाता है, इन्हें degrade के लिए जो बाहरी सब्सटेंस आए हैं और एंटीबॉडीज से जुड़ चुके हैं।

पर चुकी यह किसी ऑर्गन से जाकर चिपक चुके हैं। किसी टिशू में जाकर और जब neutrophil और कंप्लीमेंट्री प्रोटीन इन्हें डी ग्रेड करने का प्रयास करते हैं यानी इन्हें हटाने का काम करते हैं इसको हटाने के चक्कर में यह उस टिशु को damag कर देते हैं, जिससे बहुत सारी इंटरनल इंजरी हो जाती है, हाइपरसेंसटिविटी टाइप 3 के पेशेंट को, इसलिए इस डेंजरस भी माना जाता है. हाइपरसेंसटिविटी टाइप 3 को इम्यून कंपलेक्स के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रकार की हाइपरसेंसटिविटी है यह किडनी जॉइंट और ब्लड वेसल्स पर बहुत ज्यादा देखी जाती है जहां पर हाई ब्लड प्रेशर होता है।

देखिए अब बात कर लेते हैं हाइपरसेंसटिविटी टाइप 4 कि जो जनरली स्किन में देखा जाता है। देखिये क्या होता है कि जब भी कोई ऐसा केमिकल या कोई भी पैथोजन हमारी स्किन से कांटेक्ट करके हमारे शरीर में आता है, तो यह जो केमिकल हो गया यह कोई pathogen हो गया यह हमारी स्किन के cells में absorb हो जाता है। और absorb होने के बाद यह mhc टाइप 1 या 2 मॉलिक्यूल के थ्रू अपने सरफेस पर इन केमिकल या pathogen को रिप्रेजेंट करने लगता है।

जिसे टी सेल डिटेक्ट कर लेता है, t सेल क्या करता है की सबसे पहले perforin रिलीज करता है, जिसके वजह से इस सेल के surface पर छोटे-छोटे छेद बन जाते हैं। फिर उसके बाद यही t cell granzyme नाम के एक एंजाइम को रिलीज करता है, जो कि इन cells पर जाकर काम करता है और इन सेल के अंदर दरअसल ये granzyme जगह जगह ब्लास्ट करने लगते है, जिसकी वजह से यह सेल बुरी तरीके से डैमेज हो जाती है।

जब कई सारी सेल डैमेज हो जाती हैं, स्किन के पास में तो होता यह है कि उस पार्टिकुलर जगह पर जहां पर केमिकल या pathogen आया था, स्किन पर वहां पर एक ब्लिस्टर बन जाएगा skin थोड़ी फूल जाएगी और थोड़ा सा fluid भर जाएगा और inflammation की वजह से दर्द और जलन भी महसूस होने लगेगा।

इस प्रकार के हाइपरसेंसटिविटी को डीलेड टाइप हाइपरसेंसटिविटी के नाम से भी जानते हैं क्योंकि इससे डिवेलप होने में 3 से 4 दिन का भी टाइम लग जाता है।

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