बन्दूक का अविष्कार कैसे हुआ

फोर ग्रेट इन्वेंशन, वो 4 महान अविष्कार हैं जो चीन द्वारा नौवीं शताब्दी में पूरी दुनिया भर को दिया गया था। वो चार महान चीजें क्या है जो चीन ने अविष्कार करके हम मनुष्य को दिया है वह है बारूद यानी गन पाउडर, पेपर, कंपास और प्रिंटिंग। इन चारों में से बात करते हैं गन पाउंड यानी बारूद की.

बारूद का अविष्कार –

9 वीं शताब्दी में चीन के एक व्यक्ति ने तीन पदार्थों के मिश्रण से कोयला सल्फर और पोटेशियम नाइट्रेट की मदद से एक ऐसे पदार्थ को जन्म दे दिया जो बहुत ही तेजी से बर्न होता था। बाद में यही पदार्थ आगे चलकर गन पाउडर जानी बारूद के नाम से जाना गया यही से शुरुआत होती है बंदूक के जन्म होने की।

बन्दूक का प्रारम्भिक स्वरुप –

लेकिन कहानी में ट्विस्ट तो तब आता है जब 10 वीं सदी में चीन के लोगों ने बांस से बने हुए, गन का एक प्रोटोटाइप डेवलप कर लिया. जिसमें एक खोखली बांस के अंदर यह बारूद भरा जाता था. और इसी बांस के आगे की ओर कुछ तीरे भर जाती थी। पीछे से इन बारूद को आग लगा दिया जाता था।

जिसके बाद इसी बारूद की वजह से यह नुकीले तीर बहुत ही तेजी से निकलते थे। यह उस समय के इतिहास का सबसे बड़ा खोज माना जा सकता था। क्योंकि यह मनुष्य के इतिहास और डोमिनेंस करने के तरीके को पूरी तरीके से बदलने वाला था। फिर क्या था तेरहवीं सदी में बांस की जगह अब मेटल ने ले ली थी, अब मेटल की एक खोखली नली में बारूद भरकर तीरों का इस्तेमाल किया जाता था। लेकिन चीन तो भाई पहले की जमाने से पूरे दुनिया भर में व्यापार करता था चौदहवीं शताब्दी में सिल्क रूट के माध्यम से चीन द्वारा इजाद की गई ये टेक्नोलॉजी अब पूरे विश्व भर में फैल गई थी।

यूरोप में पंहुचा बंदूक –

जैसे ही चौदहवीं शताब्दी में बंदूक की एक टेक्नोलॉजी यूरोप पहुंची, यूरोप के लोगों ने इसे अपने ही तरीके से develope करना शुरू कर दिया। उन्होंने मेटल की एक नली में बारूद भरकर उसमें छोटी मेटल की गोली भरना शुरू कर दिया।

और फिर इसी तरह यूरोप के लोगों ने ही बंदूकों में पीछे की ओर हत्था बनाना भी शुरू कर दिया। जिसकी वजह से उन्हें बंदूक को पकड़ने में आसानी हो।
इस तरीके के बंदूक को arquebus कहा गया।

लेकिन समस्या यह थी कि अभी भी बंदूकों को चलाने के लिए उसमें आग बाहर से ही लगानी पड़ती थी। मतलब बाहर की ओर ही सुतली होती थी जिसमें आग लगाकर फायर किया जाता था। लेकिन 16 वीं शताब्दी की शुरुआत में बंदूकों में एक नया सिस्टम इजाद किया गया जिसे आज हम ट्रिगर के नाम से जानते हैं। इसमें होता यह था कि बंदूकों के क्लैंप के पास में एक जलती हुई सुतली रख दी जाती थी और नीचे इसे एक ट्रिगर से कंट्रोल किया जाता था ट्रिगर को दबाने पर यह जलती हुई सुतली बैरल में रखे बारूद से जा टकराती थी और बारूद में आग लग जाने के कारण से आगे से धातु की गोली बाहर बहुत ही तेजी से निकलती थी इसे मैच लॉक सिस्टम कहां गया।

लगभग 50 से 100 सालों तक तो इसी सिस्टम में कई तरीके का अपग्रेडिंग किया गया यानी इस प्रकार वाली सिस्टम में इसमें स्प्रिंग लगाया गया और भी कई तरह की तरह प्रयोग किए गए लेकिन 17 वी शताब्दी की शुरुआत में बंदूकों में बाहर से सुतली द्वारा आग लगाने वाली सिस्टम को खत्म कर दिया गया और wheellock सिस्टम को introduce किया गया।

इस व्हील लॉक सिस्टम में क्या था कि बंदूक के ट्रिगर के पास एक wheel सिस्टम लगाया गया जिसे घुमा कर छोड़ दिया जाता था। बाद में ट्रिगर के दबाने की वजह से जब पहिया घूमता था तो इसमें लगे पत्थर में रगड़ की वजह से चिंगारी होती थी और इसी चिंगारी से बारूद जलता और फायर होता था।

यह उस समय सबसे एडवांस टेक्नोलॉजी थी बंदूक के इतिहास में, बाद में इन्हीं टेक्नोलॉजी को और एडवांस करके एक डॉगलॉक सिस्टम introduce किया गया। जिसमें ट्रिगर के पास लगे पत्थर से चिंगारी उत्पन्न करने के लिए एक कील का प्रयोग किया गया कील को स्प्रिंग से खींच कर जब ट्रिगर द्वारा इसे पत्थर पर टकराया जाता तो चिंगारी बनने से गन फायर होती।

आधुनिक बंदूक का जन्म –

समय था सन 1820 का जब दुनिया में एक ऐसे मटेरियल की खोज हो गई थी जिस पर थोड़ा सा भी दबाव डालते ही ये बहुत ही तेजी से जलने लगता था। जिसका प्रयोग करके 1820 में ही कैप लॉक सिस्टम को ईजाद किया गया। इसमें क्या होता है कि एक percussion cap नाम की एक कैपनुमा संरचना होती है। जिसके अंदर एक शॉक सेंसेटिव एक्सप्लोसिव मैटेरियल जैसे मर्करी fluminate मिनट भरा रहता है। बंदूक के ट्रिगर दबाने पर बंदूक पर लगा हैमर जब इस percussion कैप से टकराता था तो यह हाईली फ्लेमेबल मैटेरियल जल जाता था और बैरल के अंदर बारूद जलने लगती थी और गन फायर हो जाती थी।

19 वी सदी का आखरी समय चल रहा था तभी बंदूक के इतिहास में सबसे बड़ी क्रांति हुई जब breech load सिस्टम दुनियाभर में आ गया था। इसमें होता था कि एक बुलेट, मेटल की बनी हुई एक खोल से जुड़ा रहता था जिसके अंदर बारूद भरी रखी थी पीछे का हिस्सा percussion cap का होता है और जब पीछे से हैमर द्वारा इस पर प्रहार होता तो गन फायर हो जाती और आज कल की दुनिया में जितनी भी gun है। सब इसी breech load system से ही चलती हैं। इस तरीके के सिस्टम को जिसमें बुलेट percussion cap और बारूद एक साथ होता है इसे कारतूस कहते हैं।

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