दायाँ फेफड़ा बाएँ फेफड़े से बड़ा क्यों होता हैं – right lung vs left lung in hindi

right lung vs left lung in hindi – देखिये जब हम सांस लेते हैं, तो सबसे पहले एयर हमारे दोनों नॉस्ट्रिल से होकर हमारे नसल कैविटी में जाती है। जहां पर हमारा एक नाक यानी ये nostril लगभग 80% ब्लॉक रहता है और दूसरा नॉस्ट्रिल 80 परसेंट खुला रहता है। जिसकी वजह से एक नाक से ज्यादा air जाती है और एक नाक से कम air जाती है। जैसे ही air nasal कैविटी को पार करती है, वैसे ही air पहुंचती है pharynx में, pharynx से फिर यही है पास होती है larynx में। वही larynx जहां से हमारी आवाज निकलती है। फिर larynx से यह पहुंच जाती है, विंड पाइप यानी trachea पर और ये trachea फिर डिवाइड हो जाता है दो bronchie में जो कि जुड़ता हैं हमारे lungs से।

ध्यान रहे इस बीच जो हम सांस लेते हैं, लगभग 500 ml air हम normally inhale करते हैं। इसमें से 150 ml air हमारे इस trachea में ही फंस जाता है। फेफड़ो में पहुंचने से पहले ही।

फेफड़े के ऊपर होता हैं एक आवरण (pleura in hindi) –

अब देखिए जब फेफड़ों में एयर पहुंचती है तो फिर फेफड़ों में मूवमेंट भी होती है। केवल फेफड़ों की नहीं बल्कि साथ ही साथ हमारे rib cage भी मूवमेंट होती है। उसी movement के जरिए ही हम एयर अंदर की ओर suck कर पाते हैं। जिससे हमारे फेफड़ों पर कुछ friction यानी घर्षण भी काम करता है। और और प्रकृति ने हमारे फेफड़ों के इस friction से डील करने के लिए हमारे फेफड़ों के ऊपर एक आवरण भी दिया हुआ है। चलिए इसके बारे में जानते हैं….

देखिए हमारे फेफड़ों के ऊपर एक layer होती है। एक membraineous layer होती है, जो कि हमारे फेफड़ों के ऊपर एक cushion की तरह काम करता है। और यह हमारे फेफड़ों के ऊपर friction को भी कम करता है। इसीलिए किसी वजह से जब भी हमारे फेफड़ों को कभी चोट लगे तो यह इस चोट के प्रेशर को अब्जॉर्ब करके उसके इंटेंसिटी को कम कर देता है, और फेफड़ों के ऊपर इस आवरण को pleura कहते हैं।

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देखिए ये जो pleura होता है, इसमें दो लेयर होती है, एक ये layer जो कि विसरल लेयर होती है, वह फेफड़ों मैं बाहर की ओर बिल्कुल चिपकी हुई रहती है और इसके ऊपर यानी हमारे chest के इंटीरियर वॉल के ऊपर एक पैराइटल लेयर होती है और इन दोनों पैराइटल और visceral layer के बीच में एक pleural space होता है, जिसमें कुछ pleural fluid भरा रहता है, जिस fluid के कारण के दोनों लेयर आपस में स्लाइड करते रहते हैं। जिससे फेफड़ों के ऊपर कभी भी फ्रिक्शन ना पड़े और फेफड़े डैमेज ना हो।

pleura in hindi

फेफड़े बटे हुये होते lobes में –

फिर जैसे ही हम इस pleural layer के अंदर जाएंगे, तब हम अपने फेफड़ों को पाएंगे और जब हम अपनी फेफड़ों को देखेंगे, तब हम यह भी देखेंगे कि हमारा ये जो दायाँ फेफड़ा है वह 3 लोब में बंटा हुआ है और यह जो बायां फेफड़ा है, वह 2 lobe में बंटा हुआ है। और प्रकृति ने मनुष्य के फेफड़ों में यह जो lobe बांटे हुए हैं, इसका purpose यही है कि किसी कारण से अगर एक लोब खराब हो जाए, तो दूसरा लोब ठीक से फंक्शन करता रहे, जिससे व्यक्ति की मृत्यु ना हो।

देखिये हमारा है जो दायाँ फेफड़ा होता है, वो लगभग 620 ग्राम का होता है और यह जो बायां फेफड़ा होता है, यह लगभग 560 ग्राम का होता है। चूंकि heart इन दोनों ही फेफड़ों के बीच में होता है, लेकिन थोड़ा बाएं ओर होता है। जिससे यह लेफ्ट lung की ऊपर एक थोड़ा सा notch बनाता है, जिससे असल में left lung के mass में थोड़ी कमी आती है। इसीलिए left lung, right से थोड़ा छोटा होता है।

फेफड़े में हैं broncioles का जाल –

अब देखिए हमारे फेफड़े में एयर आती है, इस विंड पाइप के थ्रू जिसे ट्रेकिया कहते हैं। हमारी ट्रैकिया एक सॉफ्ट टिशु से बनी हुई होती है, जब हम सांस लेते हैं, तो यह बहुत ज्यादा जरूरी है कि यह ट्रेकिया कभी collapse ना करें। हमेशा एक निश्चित शेप में बनी रहे। जिससे एयर आसानी से फेफड़ों में आ जा सके। इसलिए इस trachea के ऊपर c शेप में कुछ cartilaginous रिंग्स होती हैं। जो इस trachea को सपोर्ट करते हैं, जिससे trachea हमेशा एक ही स्थान पर बना रहता है।

देखिए यह ट्रेकिया दो भागों में विभाजित हो जाती है, जिसे प्राइमरी bronchus कहते हैं, यही प्राइमरी bronchus further secondary bronchus मैं बंट जाती हैं। फिर यही सेकेंडरी bronchus, tertiary bronchus में और यही बंटते बंटते फेफड़ों के अंदर ब्रोंकायोल्स में आकर बंट जाते हैं। बिल्कुल पतली सी नली में जिससे air आती है और फिर यही एयर अंत में आकर बिल्कुल अंगूर के गुच्छे की तरह लगने वाले alviolie में आकर खत्म हो जाती है। जिस alveolie के ऊपर ब्लड वेसल्स होती हैं। जिससे ऑक्सीजन ब्लड में घोलकर पूरे शरीर भर में फैल जाता है।

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